फिर से छोटी बच्ची हो जाऊं
जी चाहता है कि फिर से छोटी
बच्ची हो जाऊं
फिर से माँ पिताजी की
छाया में चली जाऊं
जिनकी छाया में
दिन भर खेलने पर थकती नहीं थी
सपने हमेशा देखती थी
ऊँची उड़ान भरने के लिए पंख साथ थे
खेलने की कोशिश आज भी है
सपने देखने की कोशिश भी जारी है
ऊँची उड़ान भरने की कोशिश भी है
पर आज
आज खेलने में थक जाती हूँ
सपने देखने में आँखें चुँधियाती हैं
उड़ान भरने के लिए पंख टूटे हैं
जी चाहता है फिर से
माँ पिताजी के छाया में
चली जाऊँ
29.05.15

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें